बुधवार, 24 सितंबर 2008

प्रभा खेतान की अनुपस्थिति का अर्थ

प्रभा खेतान नहीं रही , इस पर सहसा विश्वाश नहीं होता। वे हमारी ऎसी ही जरुरत बन गयी थीं। उनका अचानक यूँ चले जाना बेहद तकलीफदेह है । स्त्री विमर्श को अपनी मेधा और वैचारिक ऊष्मा से समृद्ध करने वाली प्रभा सही मायने में हिन्दी की साइमन दा बौया थीं । उनका लिखना जीवन से अलग नहीं था।

यह कहना नाकाफी है कि हम शोक संतप्त हैं । स्त्री लेखन ही नहीं समूची हिन्दी की जन संपृक्त धारा की क्षति है उनकी अनुपस्थिति ।

फिर डिटेल में कभी और ......

1 टिप्पणी:

sahityasarovar ने कहा…

prabha khetan jaisee angrajee vidushak videsh mein rahkar bhi hindi sahitya ko apnee seva pradan kartee rahin ,yeh ham hindi sahityapremiyo ke liye khushi ki baat thi lekin ab unki kami hamesha khalti rahegi