मंगलवार, 1 नवंबर 2011

अद्भुत साहित्य शिल्पी

                                                 श्रीलाल शुक्ल

जीवन को हंसी-ठिठोली में उड़ा देने का माद्दा पाठकों को भी जिंदा कर जाता है। उनके जीवनानुभवों को अपनी दिनचर्यायों में आसानी से खोज निकाल सकते हैं। राग दरबारी, गोदान और मैला आंचल की तरह ही कालजयी कृति है। उनकी लेखनी से झरता विनोद-व्यंग्य आम जन - जीवन का ही हिस्सा है। हंसी-ठिठोली और चुटीलापन उनके जीवन और साहित्य दोनों में घुला-मिला सा था। कुछ भी थोपा हुआ सा नहीं लगता। घटनाएं हमारे बीच से ही उठा ली गई लगती हैं। सहज भाषा और हल्की-फुल्की घटनाएं वर्षों तक घुमड़-घुमडक़र हमें गुदगुदाती हैं। जीवन की विडम्बनाएं, विद्रुपताएं समय के यथार्थ को ही चित्रित करता है। और साहित्य समाज का दर्पण बनकर उभर जाता है। आजादी के बाद ग्रामीण जीवन के यथार्थ को जिस तरह से उन्होंने दर्ज किया है वह आज बेहद प्रासंगिक है। श्रीलाल शुक्ल को कई-कई बार पढक़र हम बार-बार जी सकते हैं।







श्रीलाल शुक्ल (३१ दिसम्बर, १९२५ २८ अक्टूबर, २०११) सृजन-संसार का एक बड़ा नाम थे। एक अनमोल रतन। अब हमारे बीच वे नहीं हैं तो साहित्य जगत में एक स्तब्धता है। सन्नाटा है . लगता है औचक वे चले गए हैं! उनके जाने से साहित्याकाश में जो खालीपन नजर आ रहा है वह आसानी से नहीं भरा जा सकता। और जब यह बात कही जा रही है तो यह कोई रस्मी बात नहीं है! श्रीलाल शुक्ल हमारे गौरव और स्वाभिमान थे। प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु के बाद भारतीय आंचलिक परिवेश-गांव-गिरान की व्यथा-कथा और विडंबनाबोध को उन्होंने यथार्थवादी संवेदना दी। अद्भुत कथाभाषा, शिल्प के मार्फत उन्होंने अवध के जीवन का यथार्थ चित्रण किया। व्यंग्य-विनोद के कुशल शिल्पी शुक्लजी ने अपनी रचनाओं में जीवन को जिस तरह से रचा है वह बिना तलवे को कष्टï दिये, जीवन की बारीकियों को समझे संभव नहीं है। राग दरबारी में आजादी के बाद भारतीय समाज-संस्कृति में व्याप्त भ्रष्टïाचार, पाखंड, चापलूसी, विसंगतियों पर जो प्रहार किया गया है वह कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर साहित्य के आकाश में मील का पत्थर है। १९६९-७० में इस अनुपम कृति को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वहीं श्रीलाल शुक्ल की रचनाधर्मिता को सिर्फ हिंदी जगत में ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं एवं विश्व साहित्य में भी विशिष्टï दर्जा मिला। अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में अनुदित यह कृति हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों में शुमार है। बार-बार पढ़ी जाने वाली कृति। साहित्य अकादमी, व्यास सम्मान और जीवन के अंतिम दिनों में अस्पताल के बिस्तर पर सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार ज्ञानपीठ सहित उन्हें जीवन में अनेक सम्मान-पुरस्कार मिले। हर उम्र और पीढ़ी के पाठकों में राग दरबारी की लोकप्रियता रही। श्रीलाल शुक्ल की तमाम रंग की कृतियों में जो विद्रूप उभरता है वह दरअसल हमारे समाज का एक ऐसा कटु यथार्थ हैं जिससे आम जीवन का संघर्ष उभर कर आता है। आज के संदर्भ में जबकि भ्रष्टïाचार और व्यवस्था के रोग आम आदमी को दाल-रोटी और उनके हक-हकूक से महरूम कर रहे हैं श्रीलाल जी का वह विनोद, मीठे-तीखे व्यंग्य से सिक्त सटीक प्रहार प्रासंगिक है। जिस तरह से उन्होंने ग्रामीण जीवन की विसंगतियों को सहजता के साथ उद्घाटित किया है वह सूक्ष्म अवलोकन के विनियोग शक्ति का ही परिणाम है। ग्रामीण जीवन के यथार्थ को जिस तरह से शैली-शिल्प, कथ्य और भाषा के मार्फत वह रचते हैं वह अद्भुत है। उनकी रचना गुदगुदाती हैं, चिकोटी काटती है और अपनी सहजता में ही समय में हस्तक्षेप करती है।

वह एक विरले सर्जक थे। उनकी कृतियां हमारे साथ हैं और जब तक शब्द हैं तब तक वे कभी नहीं मरेंगे। वह हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं लेकिन कृतियों में जिंदा रहेंगे हमेशा-हमेशा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

प्रमुख रचनाएं

सूनी घाटी का सूरज, अज्ञातवास, राग दरबारी, सीमाएं टूटती हैं, मकान, आदमी का जहर, पहला पड़ाव, विश्रामपुर का संत (उपन्यास), अंगद का पांव, यहां से वहां, उमरावनगर में कुछ दिन (व्यंग्य)।






गुरुवार, 28 जुलाई 2011

हमारे समय की बौद्विक उपस्थिति : नामवर सिंह





 बरिष्ठ समालोचक डॉ. नामवर सिंह का हिन्दी आलोचना के विकास-विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान है। वे हमारे समय की बौद्धिक उपस्थिति हैं। उन्हीं के शब्दों में—‘जिसमें सारा हिन्दी समाज शामिल मार्क्सवाद से शुरू करके अब तक की जीवन यात्रा में वे कई उपलब्धियों से लैस आलोचक हैं। वाराणसी से तीस मील दूर चंदौली जिले के छोटा-से गांव जीअनपुर में २८ जुलाई, १९२७ को उनका जन्म हुआ। हालांकि नामवर सिंह की पुस्तकों में १ मई (श्रम दिवस), १९२७ दर्ज है। हिंदी क्षेत्र में पुनर्जागरण के नायक के रूप में उन पर आयेजित ‘ नामवर के निमित’ (अमृतवर्ष-२००२) में असली जन्म दिन का लोगों को पता चला। पिता सागर सिंह किसान और शिक्षक थे। मां बागेशवरी देवी थीं। उनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में सम्पन्न हुई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. (१९५१) और पी-एच.डी. की उपाधि (१९५६ में) प्राप्त की। पृथ्वीराज रासो:भाषा और साहित्य पर उनका शोध ग्रंथ काफी चर्चित रहा । आज भी इस पुस्तक की मौलिक दृष्टि की विशिष्ट पहचान है ।‘ हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ की भूमिका प्रो. पी.एल.वैद्य जैसे विद्वान ने लिखी थी। इसी दौरान 1९५३ से १९५९ तक उन्होंने विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के प्रिय शिष्य रहे। द्विवेदी हिन्दी साहित्य के उस समय के सर्वाधिक यशस्वी प्रोफेसर थे। जोधपुर विश्वविद्यालय, सागर, कन्हैयालाल माणिक मुंशी हिंदी विद्यापीठ (आगरा), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक के अकादमिक सफर में अनेक पड़ावों से गुजरते हुए उन्होंने कई जीवन उपलब्धियां अर्जित की। वे बेहद लोकप्रिय अध्यापक रहे। ‘अध्यापक हो तो नामवर जैसा’ उनके शिष्य आज भी कहते हैं। मध्यकालीन और आधुनिक साहित्य के बहुपठित विद्वान हैं। उनकी वक्तृता उन्हें कक्षाओं, सभागारोंं में हिट करती है। उनके शिष्यगण बताते हैं कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जे.एन. यू. तक जहां भी रहे उनकी कक्षाएं खचाखच भरी रहती थीं। दूसरे विषयों के छात्र भी उनकी कक्षाओं के गेट-खिड़कियों पर खड़े होकर उन्हें सुनते थे । हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग,पृथ्वीराज रासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, छायावाद, आधुनिक साहित्य की प्रवितियां, बकलम खुद, कविता के नये प्रतिमान, दूसरी परम्परा की खोज, वाद-विवाद संवाद आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘दूसरी परंपरा की खोज’ उनकी अपनी लिखी प्रिय आलोचना पुस्तक है। उनका कहना है कि ‘दूसरी परंपरा का मतलब द्वितीय परंपरा नहीं बल्कि एक और परंपरा है। वह गणना के क्रम में दूसरी नहीं थी।’ इसके अलावा उन्होंने ‘जनयुग’ साप्ताहिक (१९६५-६७), ‘आलोचना ’ १९६७ - ९१ का संपादन किया। पुनर्प्रकाशित ‘आलोचना’ (२००० से) के भी वे प्रधान संपादक हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल संचयन चिंतामणि: भाग-३, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध संकलन, आधुनिक रूसी कविताएं, आज की हिन्दी कहानी,नवजागरण के अग्रदूत बालकृष्ण भट्ट आदि का भी उन्होंने संपादन किया है। समकालीन साहित्य की प्रवृतियों को लेेकर उन्होनें अनेक ‘विमर्श’ खड़े किये हैं। उनकी स्थापनाएं जितनी जीवंत और मौलिक होती हैं, उतनी ही विवादास्पद! वे चांैकाऊ स्थापनाओं ने लिए विख्यात रहे हैं। विचारों में वे अत्यंत प्रगतिशील रहे हैं। इसीलिए वे अपने साहित्य-चिंतन के प्रतिमानों को बार-बार रचते रहते हैं। अब यदि उनके ‘भक्तगण ’ उन्हें विचार और इतिहास के अंत की तरह आखिरी आलोचक साबित कर चुके हों या कर रहे हों तो इसमें नामवरजी क्या कर सकते हैं? लेकिन नामवरजी भी अपनी एक चौकाउं स्थापना में ‘आचार्य शुक्ल को ही एकमात्र आचार्य घोषित कर चुके हैं , अपने गुरु द्विवेदी जी को भी नहीं’ तो इसमें नामवरजी न आचार्य शुक्ल की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं और न ही उनको आखिरी आलोचक बताने वाले उनकी प्रतिष्ठा । ‘हंस’ संपादक राजेंद्र यादव के शब्दों में कहू तो ‘वचिक ही मौलिक है’ का धर्म निवाह रहे नामवर जी ‘दूसरी परंपरा की खोज’ करके भी यदि सिर्फ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को ही आचार्य मानते हांे, अपने गुरु को भी नही ंतो यह विड़म्बना ही है। ठीक वैसे ही जैसे कुछ उत्तर आधुनिक विमर्शियों ने उन्हें अतिंम आलोचक घोषित कर दिया था। अगर ऐसा है तो इसमे शुक्ल जी और नामवर जी ही कटधरे में खड़े होते हैं कि उनके बाद उनकी परंपरा ही टूट गई। तो यह हुई दूसरी खोज जहाँ एक बार आचार्य और आलोचक पैदा होने के बाद साहित्य की धरती ही बंजर हो गयी !

आचार्य केशवप्रसाद मिश्र, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जैसे अनेक मनीषियों से प्राप्त वैदुष्य-संस्कार तथा आधुनिक भाषाओं के साहित्य का गंभीर अध्ययन उनकी आस्वाद-क्षमता को विशिष्टï बनाता है। उनकी पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिï उन्हें दूसरों से अलग करती हैं । पंडित रामअवतार शर्मा और आचार्य चंद्रधर शर्मा गुलेरी जैसे आधुनिक बोध वाले आचार्यों से भी वे खासा प्रभावित हैं। संस्कृत के इन परंपरावादी विद्वानों के आधुनिकता बोध , आचार्यत्व को नामवर सिंह सेमीनारों और लिखंत में उल्लेखित करते रहे हैं ।
नामवर जी ने अपनी क्षमता,मेधा की तुलना में कम लिखा है। वे ‘ वाचिक ही मौलिक है’ में अपार विश्वास करते हैं, यहां तक कि वह कहते हैं ‘ वे धन्य हैं जो अमर होने के लिए बोलते हैं पर मैं तो मर-मर के बोलना चाहता हूं। मेरे शुभचिंतक शिकायत करते हैं कि मैं आजकल लिखता नहीं, बोलता हूँ। उन्हंे शायद यह मालूम नहीं कि मैं बोलता ही नहीं, लोकार्पण भी करता रहता हूँ – (स्वयं को ग्रंथमोचक बताते हुए) . काशी (बनारस) उनको कचोटती रही है। वे अक्सर कहते हैं -(बाबा नागार्जुन के) उस बैल की तरह जो बेच दिया गया, अपने बथान तक बार-बार दौड़ता है। इसीलिए वे यहां आने का बहाना तलाशते रहते हैं। ‘तुम्हारी याद के जख्म भरने लगते हैं तो किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।’ बनारस छूटने के बाद वे दिल्ली में स्टार-सुपर स्टार आलोचक बनकर साहित्य संसार में छा गए । बनारस छूटने का कारण वह ‘भैरवजी का सोटा’ (मान्यता है कि काशी के कोतवाल भगवान काल भैरव के आदेश के बिना काशी में वास संभव नहीं है । ) मानते हैं । वह कहते हैं ‘काशी बार-बार मुझे दुत्कारती है फिर भी मैं काशी का हूं।’ काशी को वे ब्राह्मïण और श्रमण संस्कृति और बहुलतावादी परम्परा का केन्द्र मानते हैं। इस्लाम, बौद्घ , जैन तथा सिख परंपरा को इस विरासत से काटना संभव नहीं है। नामवर की दुत्कार वाली शिकायत की उनकी वजहें रही है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उनकी निकासी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे समर्थ गुरु के स्नेह-आशीर्वाद के बावजूद हिन्दी विभाग में चयन न होना उनके दु:ख का कारण रहा है। १९५९ में वे चकिया चंदौली लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिष्टï पार्टी के उम्मीदवार भी रहे जिसमें उन्हें असफलता मिली । बीएचयू से निकासी के कारणों में यह चुनाव माना जाता है । अभाव और बेकारी में शुरुआत का जीवन -( गर्वीली गरीबी वह) बिता चुके नामवर अब साहित्यिक जीवन उपलब्धियों की आलोचकीय समृद्घि से सम्पन्न हैं। ’हक अदा न हुआ’ नामवर जी की षष्टिपूर्ति पर लिखे भावनात्मक और महत्पूर्ण लेख मेें विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने लिखा है - मुझे याद है एक बार तो नामवर जी आदरणीय विजय शंकर मल्ल जी जैसा लम्बा कोट पहनकर इंटरव्यू देने गये। हम लोग आश्वस्त थे। केदारनाथ सिंह का विचार था कि जब ऐसा लम्बा कोट पहन कर गये हैं तब चयन होना निश्चित है। पर चयन श्री भोलाशंकर व्यास का हुआ। वहां तो द्विवेदी जी कुछ कर-धर नही पाये। मिलने पर नामवर जी को काफी ड़ांटा - अपनी किताबे क्यों नही ले गये। वहां पूछा गया, कौनसी किताबे लिखी हैं तो दिखाने को एक भी नहीं। ऐसे इंटरव्यू दिया जाता है ? क्या इससे यह ध्वनि नहीं निकलती है कि कम योग्य अभ्यर्थी का जुगाड़ या अन्य कारणों से चयन हो गया? आप ही बताइए विश्वनाथ जी, व्यासजी भी प्रतिभा, उपलब्धि -स्तर, शिक्षा के स्तर पर कहां कम थे? हालांकि व्यासजी हमेशा कहा करते थे कि काश , एक और सीट होती और नामवर भी यहां होते।
नामवर जी की मेधा, साफगोई और दृष्टि के व्यास जी कायल थे । लेकिन यह कहा जाना कि नामवर जी से कमतर का चयन हुआ सही नहीं है विश्वनाथ जी ने लिखा हैं वे दिन बहुत खराब थे। लगभग सात वर्षाे तक एम.ए., पी-एच.डी. छायावाद, हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, इतिहास और आलोचना, आधुनिक साहित्य की प्रवृतियां के लेखक डा. नामवर सिंह बेकार रहे।
साहित्य अकादमी (१९७१ में कविता के नए प्रतिमान),शलाका सम्मान(हिंदी अकादमी दिल्ली) सहित उन्हें अनेक पुरस्कार-सम्मान मिल चुके हैं। राजेन्द्र यादव के शब्दों में-‘‘सत्ता उनकी कमजोरी है। ... अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों की आरतियां उतारी हैं।’’
नामवरजी ने जितना कुछ लिखा-पढ़ा है; आलोचना को समृद्धि दी है- वह हमारे लिए गौरवपूर्ण है। यह अलग बात है कि उनकी हर आलोचना को समालोचना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । कहीं -कहीं ज्यादा आशीर्वादी और पीठ ठोकी भूमिका में रहे हैं तो कहीं काफी आक्रामक और पूर्वाग्रही । यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि नामवर का आलोचना के कुशल पारखियों का कहना रहा है । बनारस में कई-कई बार उन्हें सुनने का मौका मिला । खचाखच भीड़-भाड़ में खड़े होकर, जमीन पर बैठकर भी या जगह के अभाव में खिड़कियों -दरवाजे पर खड़े होकर भी उन्हें सुनते हुए लोगों को देखा है । उनमें साहित्य-फाहित्य से दूर-दूर तक नाता न रखने वाले भी होते हैं। बस एक बार प्रेमचंद की १२५ वीं जयंती पर वाराणसी में आयोजित संगोष्ठी में लंका से यूपी कालेज तक सरकारी लक्जरी बस के इंतजाम यानी यातायात की बेहतरीन सुविधा के और नामवर, राजेंद्र यादव जैसे स्टार वक्ताओं को पता नहीं लोग उम्मीद के मुताबिक सुनने क्यों नहीं गए जितना अकेले नामवर जी को ही सुनने जाते थे । ‘वाद-विवाद-संवाद’ में रमने वाले नामवर सिंह शतायु हों।




नामवर के बोल
 भाषा की असली ताकत उसकी भद्रता,शिष्टïता और महानता का अहंकार नहीं बल्कि उसको बोलने वाली जनता होती है । -नामवर के निमित, कोलकाता , दिसम्बर, २००१

 वास्तविक आलोचक किसी एक कृति का मूल्यांकन करते समय परोक्ष रूप से साहित्य की समस्त कृतियों का मूल्यांकन करता है, यदि वह ऐसा नही करता तो वह मूल्यांकन ही नहीं है, और उसके अंतनिर्हित प्रतिमान में कही न कही असंगति है। - नामवर सिंह , इतिहास और आलोचना

 “मैं मार्क्सवादी हूँ पर कई प्रश्नों पर बार-बार सोचता हूँ। आज बदले हुए दौर में कई ऐसे प्रश्न हैं जिनका जबाब हमें मार्क्सवाद में नही मिलता।“
 उपन्यास अगर पाठ ही है, तो मर जायेगा। गोदान में गुठली है। ‘रस’ न हो तो कालजयी कृति हो ही नहीं सकता। युगों-युगों तक गोदान पढ़ा जाता रहेगा तो ‘रस’ के कारण, कलाकृति के कारण। क्योंकि वो वर्णन इतिहास, समाजशास्त्र में भी मिल जाएगा। बंधी-बंधायी विचारधारा के आधार पर न मूल्यांकन किया जाए। रचनाकार की कृति में जो राग बना है, उसको देखें। गोदान का यही बड़प्पन है। सीपीआई, सीपीएम,सीपीआई एमएल वाले अपनी-अपनी विचारधारा ढूंढ़े? गोदान विचारधारा को अतिक्रमित करता है। उसके मर्म को जानने के लिए विचारधाराओं के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए।
 ‘गोदान’ विशाल वाद्य वृंद्य है। सबने अपना-अपना सुर मिलाया है। जो लोग ‘गोदान’ में केवल दलित विमर्श देखते हैं, स्त्री विमर्श देखते हैं, यह देखना गोदान के टुकड़ों को देखना है। संपूर्ण की उपेक्षा करना है। गाय ‘गोदान’ में यदि रूपक है, प्रतीक है, अनेक आदर्शों का प्रतीक बन जाती है। होरी खुद गाय है। गाय की इच्छा रखने वाला खुद गाय है। गाय जानवर या संपत्ति नहीं है। उसके मरजाद, आत्मसम्मान का भी सूचक है। गाय के साथ जमीन भी जुड़ा, है, उसके समूचे मनुष्यत्व का प्रतीक है। उस दौर में प्रेमचंद का वह ‘स्वराज्य’ है। उसके सपने का अर्थ हमें खोजना चाहिए। प्रश्न कर रहा हूं...क्या गोदान प्रेमचंद के लिए वही है जो कैपिटल में माक्र्स के लिए ‘मनी’ थी। किस गांधी का उन्होंने अतिक्रमण नहीं किया? ‘गांधीवाद’ नहीं छौड़ा था इसकी और व्याख्या करनी चाहिए। प्रेमचंद को विचारधाराओं के फंडे में न बांधों। प्रगतिशीलों को और सावधानी बरतनी चाहिए।
                                   सीनेट हॉल , स्वतंत्रता भवन, बीएचयू, ६-११-२००५
 मेरी जानकारी में राजा शिव प्रसाद ’सितारे हिन्द’ को लेकर हिन्दी की यह पहली गोष्ठी है और खुशी की बात है कि काशी मे हो रही है। 1995 में उनके निर्वाण काल की शताब्दी मानायी जा सकती थी लेकिन उनको काशी भी भूल गयी और बाहर वाले भी भूल गये। इसे भूल सुधार के रूप में दर्ज किया जाना चाहिये तथा इस प्रयास के लिए समस्त हिन्दी जगत को वीरभारत का कृतज्ञ होना चाहिये।
 भारतेन्दू जैसा साहित्यकार 19वी सदी में कोई नही हुआ। राजा साहब का क्षेत्र अलग था। वे दूरदर्शी शिक्षा शास्त्री थे जिन्हंे साहित्य और संस्कृति से गहरा लगाव था। वीरभारत तलवार को सावधानी बरतनी चाहिये नही ंतो भूल सुधार के चक्कर में एक और गम्भीर भूल हो जायेगी। हिन्दू और मुस्लिम जैसे विषयों पर वीरभारत फिर से विचार करें नही तो भूल को दूरुस्त करने में एक और भूल होगी। वीरभारत को हजार फटकार लगाईए लेकिन अगर यह किताब नही आयी होती तो यह चर्चा भी नही होती। वीरभारत ने बनारसी रंग देख लिया। साहित्य का पानीपत बनारस है, वीरभारत को लड़ाई यहां जितनी पडेगी। जो सवाल खासतौर पर अवधेष प्रधान और बलराज पाण्डेय ने उठाए उसका जबाब दिया जाना चहिये था। तलवार ने पहले ही लिखा है कि राजा साहब को हिन्दी वाले खलनायक मानते हैं और बस वे ही एक उन्हें नायक मानते हैं।----15-09-2004, वाराणसी, डायमण्ड होटल, राजा शिव प्रसाद ’सितारे हिन्द’ और 19 सदी का हिन्दी गद्य




गुरुवार, 21 जुलाई 2011

नसीरुद्दीन शाह -- अभिनय की कसौटी

नसीरुद्दीन शाह  (जन्म: २० जुलाई-१९५०) -एक ऐसा अभिनेता जिसकी रग-रग में अभिनय बसता हो। बहुमुखी प्रतिभा के धनी शाह ने अपनी भूमिकाओं से सिनेमा- संसार को कलात्मक विस्तार दिया। सृजन विस्तार । चाहे वे स्टेज एक्टर हों या फिल्मी एक्टर... उन्होंने विभिन्न चरित्रों में अभिनय के नए-नए शेड्स दिए। तीन दशकसे अधिक के अपने क़लातमक़ करियर में हर तरह के किरदार में वे खूब जमे । ‘स्पर्श’ और ‘मासूम’ में उनके परफॉरमेंस को कैसे भुलाया जा सकता है।


बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे नसीर ने जहां राष्टरीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से थिएटर का प्रशिक्षण लिया, वहीं भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) से सिनेमा के गुर सीखे।

मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की फिल्म ‘निशान्त’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ में नसीर ने अपने अभिनय द्वारा सहज ही ध्यान आकृष्ट किया। अपनी कलात्मकता को ऊंचाई दी। १९७० के दशक में समांतर सिनेमा आंदोलन के दौर में उनकी प्रतिभा को बड़ी सम्मानित पहचान मिली। साईं परांजपे के स्पर्श, सईद मिर्जा के अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, गोविंद निहलानी के ‘आक्रोश’ और केतन महता के ‘मिर्च मसाले’ में नसीरुद्दीन शाह के चरित्र ने हिंदी सिनेमा को अभिनय की उल्लेखनीय छटा दी।

इसके अतिरिक्त व्यवसायिक फिल्मों ‘कर्मा’, ‘जलवा’ और ‘त्रिदेव’ आदि में भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। मुख्य धारा की व्यवसायिक फिल्मों में हास्य से भिगी चारित्रिक और खल भूमिकाओं में भी वे अपने अभिनय को विस्तार और विविधता देते नजर आए। शाह ने हॉलीवुड में भी कुछ फिल्में की हैं। साथ ही मिर्जा गालिब और भारत एक खोज जैसे टीवी धारावाहिकों में भी काम किया है।

उन्हें सर्वश्रेष्टï अभिनय के लिए तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। १९८० में ‘आक्रोश’ १९८१ में ‘चक्र’ और १९८३ में ‘मासूम’ के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार विजेता बने। गौतम घोष के ‘पार’ में संजीदगीपूर्ण भावाभिनय के लिए उन्हें १९८४ वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का वोल्पीकप मिला। इसी फिल्म पर वे १९८४ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में राष्टï्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता भी बने।

नसीर का मन आज भी थिएटर में ही रमता है। वे अभिनय की तलाश में आज भी जिज्ञासु बने हुए हैं। नसीर ने कभी भी अपने कलाकार से समझौता नहीं किया। अच्छे चरित्र और बेहतरीन पटकथा की उनकी तलाश जारी है। वही किरदार चुनते हैं, जो उनहें छूते हैं कोई भी ऐसी फिल्म नहीं करते, जिसमें मजा न आए। नसीर का मानना है िक़ जब भी उन्होंने कोई भी फिल्म बेमन से की है, वह लोगों न॓ भी पसंद नहीं क़ी है। सृजन सरोकारों के समय वे हमेशा गतिशील बने रहें। जीवन की गति के साथ। तुम जियो हजारों साल...। जीवेत् शरद: शतम ।



फिल्मोग्राफी—

१९७५ : निशान्त

१९७६ : मंथन, भूमिका

१९७६ : मंथन, भूमिका

१९७७ : गोघूलि

१९७८ : जुनून

१९७९ : सुनयना, स्पर्श

१९८० : आक्रोश, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा

क्यों आता है, अंधेर नगरी, चक्र

१९८१ : सजा-ए-मौत, उमराव जान, आधारशिला

१९८२ : बेजुबान, बाजार, मासूम, स्वामी दादा

१९८३ : अद्र्ध सत्य, मंडी, वो सात दिन

१९८४ : पार्टी, पार

१९८५ : बहु की आवाज, गुलामी, मिर्च मसाला, त्रिकाल, खामोश

१९८६ : कर्मा, जलवा

१९८७ : इजाजत

१९८८ : जुल्म को जला दूंगा, हिरो हिरालाल

१९८९ : त्रिदेव, खोज

१९९० : चोर पे मोर

१९९१ : शिकारी, लिबास

१९९२ : विश्वात्मा, तहलका, चमत्कार

१९९३ : सर, कभी हां-कभी ना

१९९४ : मोहरा, द्रोहकाल

१९९५: नाजायज, टक्कर

१९९६ : चाहत, हिम्मत

१९९७ : लहू के दो रंग

१९९८ : सरफरोश

१९९९ : भोपाल एक्सप्रेस

२००० : गजगामिनी

२००१ : मोक्ष

१९७७ : गोघूलि

१९७८ : जुनून

१९७९ : सुनयना, स्पर्श

१९८० : आक्रोश, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा

क्यों आता है, अंधेर नगरी, चक्र

१९८१ : सजा-ए-मौत, उमराव जान, आधारशिला

१९८२ : बेजुबान, बाजार, मासूम, स्वामी दादा

१९८३ : अद्र्ध सत्य, मंडी, वो सात दिन

१९८४ : पार्टी, पार

१९८५ : बहु की आवाज, गुलामी, मिर्च मसाला, त्रिकाल, खामोश

१९८६ : कर्मा, जलवा

१९८७ : इजाजत

१९८८ : जुल्म को जला दूंगा, हिरो हिरालाल

१९८९ : त्रिदेव, खोज

१९९० : चोर पे मोर

१९९१ : शिकारी, लिबास

१९९२ : विश्वात्मा, तहलका, चमत्कार

१९९३ : सर, कभी हां-कभी ना

१९९४ : मोहरा, द्रोहकाल

१९९५: नाजायज, टक्कर

१९९६ : चाहत, हिम्मत

१९९७ : लहू के दो रंग

१९९८ : सरफरोश

१९९९ : भोपाल एक्सप्रेस

२००० : गजगामिनी

२००१ : मोक्ष



शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

मणि कौल : सिनेमा संसार की अप्रतिम उपलब्धि

25 DECEMBER 1944-6 JULY 2011
सिनेमा एक कला है। जीवन के विविध आयामों को पर्दे पर उकेरना निश्चित ही एक कठिन विधा है। जनमानस की कलात्मक अभिव्यक्ति सिनेमा को नया प्रारूप देती है। रंग देती है । जीवन देती है । कला के बहुरंगी रंगों में रंगकर अभिव्यक्तियां और भी मुखर हो उठती हैं। विविध सुरों-लयों-तालों में नाच-गाकर सिनेमाई छवियां तरंगित हो उठती हैं। पर्दे पर जीवन नये रूप में उभर आता है। कलात्मक फिल्में कला को सम्मान देने का नाम है। व्यवसायिक फिल्मों के समय में चमक-दमक और ग्लैमर से परे कला फिल्मों की सफलता एक चुनौती है। व्यवसायिक फिल्मों के साथ बदलती दर्शकों की पसंद के बीच जगह बनाना एक उपलब्धि है। ऐसी उपलब्धि और जगह महान निर्देशक ही बना पाते हैं। मणि कौल ऐसे ही महान निर्देशकों में थे जन्होंने कला और समानांतर फिल्मों की चुनौतियों को स्वीकारा ही नहीं जिया भी। विविध कला-प्रारूपों को सिनेमा में गूंथकर पर्दे पर ले आये। चित्रकला और मूर्तिकला के रंग भरे और गढ़े। संगीत, नृत्य, वाद्य-यंत्रों के साजो-सामान, सुर लहरियों, तालों-थपकियों को सिनेमा में नई जगह दिलाई। एकबहुआयामी सर्जकके रूप में मणि कौल ने जो कुछ दिया वह सिनेमा संसार की अप्रतिम उपलब्धि है।

भारतीय सिनेमा इतिहास के पुरोधाओं में शुमार ऋत्विक घटक के शिष्य और निर्देशक महेश कौल के भतीजे मणि कौल जटिल, वास्तविक और अद्वितीय सिनेमाई भाषा के विकास के लिए जाने गये। जोधपुर राजस्थान में जन्मे मणी कौल ने जयपुर युनिवर्सिटी तथा फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे से शिक्षा प्राप्त की। छोटी उम्र से ही सिनेमा की ओर रुझान रखने वाले मणि ने अपने करियर की शुरुआत छोटी-मोटी एक्टिंग असाइनमेंट्स और लघु फिल्मों के निर्देशन के साथ की। १९६९ में इन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म ‘उसकी रोटी’ बनाई, जिसे आज नये भारतीय सिनेमा आंदोलन के पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखा जाता है। फिल्म की लघु वर्णनीय तथा प्रयोगात्मक शैली इसे भारतीय सिनेमा के स्थापित मूल्य से अलग करती है और इसने गम्भीर आलोचनात्मक समीक्षायें भी बटोरी। इस फिल्म को १९७० के सर्वश्रेष्ठ फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया।


कौल प्रयोगधर्मी निर्देशक थे और अपनी फिल्मों में हमेशा नई सम्भावनायें तथा उतकृष्टïतायें तलाशते रहते थे। ‘आषाढ़ का एक दिन’ (१९७१)तथा ‘दुविधा’(१९७३) इसी श्रेणी की फिल्में थी। ‘दुविधा’ ने मणी को १९७३ के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी दिलाया। शास्त्रीय संगीत के राग ध्रुपद में मणी की गहरी अभिरुचि थी। इन्होंने डागर बंधुओं से इस राग की प्रेरणा भी ली। उनका वृत चित्र ‘ध्रुपद’ (१९८२) इस राग के स्पेसों और प्रकाश के विविध उपयोगों के संगीतमय आयाम को प्रदर्शित करता है। आगे चलकर नये निर्देशकों में भी मणी तथा ‘ध्रुपद’ के प्रति के विविध उपयोगों के संगीतमय आयाम को प्रदर्शित करता है। आगे चलकर नए निर्देशकों में भी मणी तथा ‘धु्रपद’ के प्रति विशेष अनुरक्ति देखी गई।

संगीत तथा कलाकारों के लिए लगाव कौल की फिल्मों में सहज ही नये निर्देशकों में भी मणी तथा ‘ध्रुपद’ के प्रति विशेष अनुशक्ति देखी गयी। लगाव कौल की फिल्मों में सहज ही दिख जाता है। सुप्रसिद्ध ठुमरी गायिका सिद्धेश्वरी देवी पर आघृत उनका फीचर ‘सिद्धेश्वरी’(१९८९) अपने तरह की अलग फिल्म है। फिल्म में सिद्धेश्वरी देवी के जीवन की विविध भाव भंगिमाओं, अवस्थाओं, पड़ावों तथा अलग फिल्म है। फिल्म में सिद्घेश्वरी देवी के जीवन की विविध भाव भंगमाओं, अवस्थाओं, पड़ावों तथा विशेषत: संगीत के माध्यमों द्वारा दर्शाया गया है। फिल्म देखकर ऐसा लगता है कि फिल्म ‘ठुमरी’ की ही संगीतमय लहरों की तरह सिद्धेश्वरी देवी की बानगी है। जिसमें संगीत तथा उनकी जीवनगाथा एकाकार-सी लगती है। इस फिल्म को (१९८९) का राष्ट्रीय कला फिल्म पुरस्कार मिला।

मणि की कला-मिमांसा संगीत तक ही सीमित नहीं रहती वरन् विभिन्न कला प्रारूपों को छूती हुई इनकी फिल्में में समाहित हैं। टेराकोटा मूर्तियों तथा परंपरा पर आघृत ‘मति मानस’ (१९८४) ने अपार प्रशंसा बटोरी। साथ ही मलिक मुहम्मद जायसी की एक कविता से अभिप्रेरित तथा संस्कृत साहित्य से ली गई एक प्रेम कहानी पर बनी फिल्म ‘द क्लाउड डोर’ ने भी विशिष्ट आलोचनात्मक समीक्षायें जुटाई। मणी कौल की आखिरी फीचर फिल्म विनोद कुमार शुक्ला लिखित ‘नौकर की कमीज’ (१९९८) रही। महान निर्देशक और कला प्रेमी मणी कौल की मृत्यु ६६ वर्ष की उम्र में ६ जुलाई, २०११ को हो गई। फीचर तथा डाक्यूमेंट्री दोनों ही तरह की फिल्में बनाने वाले मणि की फिल्मों में कला के विविध प्रारूप हमेशा मौजूद रहे। उनके वृत्तचित्रों तथा फीचरों की विभाजन रेखा भी काफी महीन होती थी। हमेशा उत्कृष्ट एवं कलात्मक फिल्में बनाने वाले कौल भारत में समानांतर फिल्मों के जनकों में शुमार नाम भर ही नहीं थे बल्कि एक महान सर्जक, गुरु, दोस्त और ईंसान भी थे। भारतीय सिनेमा को उनकी कमी हमेशा खलेगी। सचमुच कवि-कथाकार के उदय प्रकाश के शब्दों में- मणि कौल का जाना कला किरीÅ से एक मणि का कम हो जाना है।





गुरुवार, 9 जून 2011

जिंदगी की पुनर्रचना

                       चंद्रबली  सिंह
                            (20 अप्रैल,1924 -23 मई, 2011)



मोहक , निश्छल मुस्कान और सरलता। सहज और अच्छे इंसान। मार्क्सवादी आस्था। दृढ़। जड़ नहीं। माने चंद्रबली सिंह । चंद्रबली जी ने अपनी सहजता, सरलता और सादगी से कभी भी बड़प्पन या ऊँचाई का आभास नहीं होने दिया। वे अपने से छोटे को भी सम्मान देते थे . मित्रवत पेश आते थे. उनका होना सिर्फ बनारस , हिंदी और विचार की दुनिया के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं था , बल्कि मानवीय संवेदना के लिए भी आस्वस्तिदायक था. 
उन्हें गोष्ठियों में सुनना अद्भुत था. ज्ञान -विचार की अनगिनत बातें और बातों की सार्थकता हर किसी को सुख देती थी. उनसे बोलने -बतियाने में हिचक नहीं होती थी . दूरी नहीं लगाती थी.  उनके पास जाने के लिए बहुत सोचना -समझना नहीं पड़ता था . वे सचमुच सरल थे . चालक , शातिर और 'मुख में राम बगल में छुरी ' वाले नहीं थे. विचार उनके लिए 'पोलिटिकली करेक्ट' मुदा नहीं था.
समकालीन समाज, राजनीति, इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर सचेत दृष्टि रखने वाले प्रगतिवादी समालोचक चंद्रबली सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं। पिछले कई वर्षों से  वे मौत से जूझ रहे थे। लंबे समय से अस्वस्थ थे। बिस्तर पर थे। उनमे अद्भुत जिजीविषा शक्ति थी।  वाराणसी के विवेकानंद नगर स्थित अपने आवास में शारीरिक लाचारी के बावजूद साहित्य के व्यापक परिपेक्ष्य  से जुड़ी चर्चाओं में मशगूल रहते थे।
समाज से व्यक्ति का व व्यक्ति से समाज के परायेपन की भावना को कैसे खत्म किया जाये-कार्ल मार्क्स की चिंता को उन्होंने गहरे अर्थों में आत्मसात् किया। मार्क्सवादी दर्शन के प्रति अंत तक उनका विश्वास बना रहा। यहां तक विश्वास कि दुनिया से मार्क्सवाद खत्म हो जाए, तब भी कहंूगा कि मैं मार्क्सवादी हूँ। विचलन और विचार के अंत वाले उत्तर आधुनिक समय में वे संघर्षशील वैचारिकता के साथ अडिग खडे़ थे।  कहते थे तुलसीदास के जाके प्रिय न राम वैदेही  की तरह मेरी वैचारिक दृढ़ता और प्रबल होती जा रही है। 1982 में वे जनवादी लेखक संघ (जलेस) के महासचिव चुने गए। उसके बाद अध्यक्ष पद पर पन्द्रह साल तक अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह करते रहे। जनवादी लेखक  संघ के संस्थापक  महासचिव के रूप में लेखकों  को संगठित और जनता के पक्ष में गोलबंद करने की उनकी भूमिका थी। कलमपत्रिका के संपादक भी रहे। जीवनधर्मी विवेक और जनधर्मी आलोचकीय चेतना के लिए जाने -जाने वाले चंद्रबली जी मनुष्यता के मोर्चे पर भी महान थे। चंद्रबली जी जनपक्षधर आलोचक होने के साथ विश्व कविता के महत्वपूर्ण अनुवादक थे।
रामविलास शर्मा  के निधन के बाद उनकी बरसी पर याद करने के बहाने उनके पूरे अवदान को ही संदेह के घेरे में रखे जाने के आलोचना’- समय में उन्होंने कहा था - आज रामविलास जी पर चारों ओर से हमले हो रहे हैं। एक तरफ से दिखाया जा रहा है कि उनका सारा लेखन मार्क्सवाद विराधी रहा है । उनकी नियत में ही संदेह प्रकट किया गया है। तमाम लोग उन पर लिख रहे हैं और लोग सोच रहे हैं कि चंद्रबली चुप क्यों हैं । मैं जवाब दूंगा। काश! स्वास्थ्य उनका साथ देता।
 बाबरी विध्वंश पर उन्होंने कहा था कि स्वयं मनुष्यता ने ढ़ेर सारी हार-जीत देखी है। वह कहते थे कि वर्तमान के यथार्थ का अगर हमने सामना करना नहीं सीखा, तो हम भविष्य नहीं बना सकते।
वह कहते थे कि हमारा काम यह है कि कवियों में जो जनवादी तत्व देखें उसे हम विकसित करने की कोशिश करें और जो जनविरोधी हैं उनके खिलाफ आवाज उठायें। कुल्हे के ऑपरेशन तथा बीमारी के बावजूद उनकी जिजीविषा अशक्ता में भी बरकरार थी। मित्रवत पुत्र डा. प्रमोद कुमार सिंह बब्बू जी का बिछुड़ जाना  भी रचनात्मक सक्रियता और वैचारिक दृढ़ता से ही सह्य हो पाया। रामविलास जी ने चंद्रबली जी की पत्नी के निधन पर एक पत्र लिखा था कि तुमने निराशा और मृत्यु का मुंह देख लिया है। लेकिन पराजय तुम्हारे लिए नहीं हैं।’ (डा. शर्मा का पत्र)। उनकी सृजन क्षमता  व्यक्तिगत जीवन के तमाम झंझावतों के बावजूद उसी जीवन दृव्य  से सिंचित  थी जिसमें मानव जीवन की बहतरी की चिंता है। इसीलिए वह कहते थे कि लेखक  को जिंदगी की पुनर्रचना करनी चाहिए। उनकी जैसी सरलता-सहजता  अब दुर्लभ होती जा रही है। वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं है लेकिन वे अपने किये-धरे में हमेशा जीवित रहेंगे। उनका जीवन और साहित्य हमारे लिए प्रकाश स्तंभ है। 



 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

समालोचक चंद्रबली सिंह



हिन्दी के प्रगतिवादी समालोचक चंद्रबली सिंह 20 अप्रैल, 2011 को अपने जीवन-संघर्ष के 87 वर्ष पूरे


किये । उनके जैसे सहज-सरल सह्नद्य व्यक्तित्व की उपस्थिति सांस्कृतिक परिदृष्य के लिए भी विशेष महत्व की  है । समकालीन समाज, राजनीति, इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर उनकी दृष्टि हमेशा सचेत, सक्रिय और संघर्षशील रही है। हिन्दी के प्रतिभाशाली समालोचक चंद्रबली सिंह मार्क्सवादी समाज-दर्शन की गहरी समझ रखने वाले बौद्विक अध्येता और व्याख्याकार हैं। समाज से व्यक्ति का व व्यक्ति से समाज के परायेपन की भावना को कैसे खत्म किया जाये - यह कार्ल मार्क्स की चिंता थी, इसे चंद्रबली जी ने गहरे अर्थो में आत्मसात किया है । चंद्रबली जी अपनी सहजता और सादगी से कभी भी बड़प्पन या ऊँचाई का अभास नहीं होने देते। 20 अप्रैल , 1924 को गाजीपुर के रानीपुर (ननिहाल) में जन्मे चंद्रबली सिंह की शिक्षा उदय प्रताप इण्टर कालेज तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संपन्न हुई। सन् 1994 में अंग्रजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने बलवन्त राजपूत कालिज (आगरा) और उदय प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय में चालीस वर्षो तक अध्यापन किया।



जीवनधर्मी विवेक और जनधर्मी आलोचकीय चेतना के लिए जाने-जाने वाले चंद्रबली जी की पहली पुस्तक 1956 में लोक दृष्टि और हिन्दी साहित्य (आलोचनात्मक निबंधों का संकलन ) प्रकाशित हुई। 46 साल बाद दूसरी पुस्तक आलोचना का जनपक्ष (2003) प्रकाशित हुई। नोबेल पुरस्कार विजता चिली के विश्वविख्यात कवि पाब्लो नेरुदा (1904-1974) के जन्मशती वर्ष में उनके द्वारा किया गया अनुवाद पाब्लो नेरुदा कविता संचयन साहित्य अकादमी से 2004 में छपकर आया। इस अनुवाद का व्यापक स्वागत हुआ। सिर्फ हिन्दी में ही नहीं , बल्कि भारतीय भाषाओं के प्रबुद्ध साहित्यिकों ने भी चंद्रबलीजी के इसे गंभीर प्रयास बताया। भारत में चीली के राजदूत जार्ज हेन ने भी हिन्दू में लिखे अपने पाब्लो नेरूदा विषयक लेख में चंद्रबलीजी की अनुवाद का जिक्र किया। चर्चित आलोचक डा. नामवर सिंह ने लिखा है कि ऐसे काव्यात्मक स्तबक के लिए हिन्दी जगत अपने व्रिष्ठ जनवादी समालोचक के प्रति कृतज्ञ रहेगा। पाब्लो नेरुदा के अलावे उन्होंने नाजिम हिकमत, वाल्ट ह्रिटमैन, एमिली डिकिन्सन, ब्रेख्त, मायकोव्सकी, राबर्ट फ्रास्ट जैसे विख्यात विशिष्ट कवियों का भी अनुवाद किया है। चर्चित कथाकार काशीनाथ सिंह कहते हैं आलोचना के समानांतर उनका अनुवाद कार्य अद्भुत है और जिनके अनुवाद किये हैं, वे एक तरह के कवि नहीं हैं। प्रायः मार्क्सवादी समीक्षक आपाठय, दुर्गम खूसट और सठियाये हुए गद्य लिखते हैं, इससे मास्टर साहब (चंद्रबली जी) की समीक्षा दूर है।


अपने शुरुआती लेखकीय जीवन से ही वे कवियों की कृतियों एवं विविध काव्य-धाराओं पर लिखते रहे हैं। चंद्रबली सिंह की आलोचकीय दृष्टि को प्रख्यात समालोचक (स्व.) रामविलास शर्मा बखूबी महत्व देते थे। डॉ शर्मा चाहते थे कि चंद्रबलीजी अपनी प्रतिभा का पर्याप्त लेखकीय- उपयोग करें। उन्होंने अपनी एक पुस्तक भी ...भूतपूर्व आलोचक चन्द्रबलीजी को समर्पित की... । इस आत्मीयता में अप्रतिम मेघा के रहते हुए चन्द्रबली द्वारा कम लिखने के प्रति एक शिकायती प्रोत्साहन छिपा है।
चन्द्रबली जी को भी यह पीड़ा तो है कि आलोचना की उनकी और किताबें होनी चाहिए थी .  ’भारत-भारती के सर्जक राष्ट़कवि मैथिलीशरण गुप्त (1886 - 1964) की रचऩाऒं एवं उनकी काव्य-दृष्टि तथा संवेदना को लेकर प्रगतिशील आलोचक अक्सरहां बेहद अनुदार रहे हैं। उन्हें पुनरुत्थनवादी और अंध हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में भी देखा जाता रहा है। चंद्रबली ही अपनी मौलिक दृष्टि से इसे नकारते हैं - गुप्त ही पुनरुत्थानवादी नहीं हैं - उनकी राष्ट्रीयता गांधी युग की राष्ट्रीयता है, जो धार्मिक पुट के बावजूद सांप्रदायिक वैमनस्य से मुक्त है, जिसमें वैष्णव उदारता है और जो देश के साथ-साथ सारी मानवता को प्यार कर सकती है। इस दृष्टि-संपन्त्रता के कारण ही उनका (चंद्रबली जी) समकालीन आलोचकों में एक अलग स्थान रहा है। रामविलास जी की तरह ही उन्होंने अपनी परंपरा का सावधान मुल्यांकन किया तथा पूरी जिम्मेदारी और दायित्व बोध से साहित्य समग्र में काम किया।
रामविलास शर्मा के निधन के बाद उनकी बरसी पर याद करने के बहाने उनके पूरे अवदान को ही संदेह के घेरे में रखे जाने के ’आलोचना’ समय में उन्हॉऩॆ कहा था - आज रामविलास जी पर चारों ओर से हमले हो रहे हैं। एक तरफ से दिखाया जा रहा है कि उनका सारा लेखन मार्क्सवाद विरोधी रहा है। ये कहने वाले ज्यादातर अपने को मार्क्सवादी कहते हैं। उनके नीयत में ही संदेह प्रकट किया गया। तमाम लोग उन पर लिख रहे हैं और लोग सोच रहे हैं कि चंद्रबली चुप क्यों हैं ? मै जवाब दूंग़ा।  उनका मानना है कि डा. शर्मा की बहुत सी मान्याताओं को मानें या न मानें लकिन व भारत में समाजवादी विचारो के लिए जीवन के अंतिम दिऩॊ तक संघर्ष कर रहे थे, इसके बारे में संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता। नवजागरण के नेताओं मे रामविलास जी का नाम सर्वप्रमुख रहेगा। ऐसा व्यक्ति ’रेनेसां’ काल में हुआ है कि एक ही व्यक्ति विविध क्षेत्रों में अपने व्यक्त्वि को फैलाया हुआ है। वे केवल (सीमित अर्थो में) साहित्यकार नहीं थे। ऐसा भी नहीं कि वह डा. शर्मा की सभी मान्यताओं से सहमत रहे हॉ ।

उन्होंने एक बेहद कड़ा असहमतिपरक-लेख रामविलास शर्मा पर लिखा है क्योंकि विचारो से कोई समझौता करना मैंने कभी नही सीखा। यह सही भी है क्योंकि अब तक का सर्वाधिक कडा सैद्वातिक असहमति वाला लेख चंद्रबली सिंह ने डॉ़ शर्मा पर ही लिखा है जो जनयुग (स़़. नामवर सिंह ) में तीन किस्तों में प्रकाशित हुआ था।

इस विचलन के दौर में वे संघर्षशील वैचारिकता के साथ अडिग खडे हैं। उनका मानना रहा है कि तुलसी दास के जाके प्रिय ना राम बैदेही की तरह मेरी वैचारिक दृढ़ता और प्रबल होती जा रही है। बाबरी विधवंश पर उन्होने कहा था स्वयं मनुष्यता ने सारी हार और जीत देखी है। वे कहते हैं कि वर्तमान के यथार्थ का अगर हमनें सामना करना नहीं सीखा तो हम भविष्य नही बना सकते। प्रगतिशील आलोचना के स्थापत्य मे उनके अवदान का जिक्र करते हुए वरिष्ठ समीक्षक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने लिखा है कि - एक जमाना था जब रामविलास शर्मा के बाद उन्हीं का नाम लिया जाता था और उस जमाने के लोग आज भी यह बताते हैं कि सृजनात्मक साहित्य के मर्म को पकडने और कलात्मक संवेदना की व्याख्या का जैसा औजार उनके पास रहा है, वैसा उनके समकालीनों में किसी के पास नहीं रहा हैं। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नकेनवाद, नयी कविता, मुक्तिबोध, नेमिच्रंद्र जैन, गिरिजा कुमार माथुर, अज्ञेय, नागार्जुन,त्रिलोचन आदि पर उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियां, निबंध और संदर्भ इसकी पुष्टि करते हैं। उनकी राय है कि हमारा काम यह है कि कवियों में जो प्रगतिशील व जनवादी तत्व देखें उसे हम विकसित करने की कोशिश करें और जो जनविरोधी हैं उसके खिलाफ आवाज उठायें। उम्र के इस पडाव पर भी उनकी चिंताएं, उर्वर हैं। प्रेमचन्द की 125 वीं जयन्ती के निमित्त लमही (वाराणसी) में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में उन्होंने संगोष्ठी की अध्यक्षता की थी । 6 नवम्बर, 2005 को गोदान को फिर से पढ़ते हुए..... अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी (वाराणसी में आयोजित) के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की थी । कुल्हे के आपरेशन के तथा बीमारी के बावजूद उनकी जिजीविषा अभी अशक्तता में भी बरकरार है। मित्रवत पुत्र (स्व.) डा. प्रमोद कुमार सिंह (बब्बू जी) का एकाएक बिछुड़ जाना रचनात्मक सक्रियता से ही सहय हो पाया। रामविलास जी ने डेढ़ दशक पहले एक पत्र में लिखा भी था कि ’.... तुमने निराशा और मृत्यु का मुंह देख लिया है लेकिन पराजय तुम्हारे लिये नही है, धाराशाई होने पर भी नहीं है। .... (चंद्रबली जी की पत्नी के निधन पर डा. शर्मा का पत्र)। उनकी सृजन-क्षमता व्यक्तिगत जीवन के तमाम झंझावतों के बावजूद उसी जीवन द्रव्य से सिंचित है जिसमें मानव जीवन की बेहतरी की चिंता है । इसलिए वे कहते है लेखक को जिंदगी की पुनर्रचना करनी चाहिए। वाराणसी के विवेकानंद नगर स्थित अपने आवास में शारीरिक लाचारी के बावजूद साहित्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जुडी चर्चाऒं में मशगूल रहते हैं। साहित्य और विचार की चेतना और संवेदना में कोई कमी नहीं आयी है .  बिस्तर तक सिमटे रहने के बावजूद उनकी जिजीविषा में कमी नहीं आयी .  वॆ अपने समय के जीवित इतिहास हैं। उनके जैसी सरलता-सहजता अब दुर्लभ होती जा रही है । काश ! इस पुनर्रचना से सिक्त उनके अधूरे तथा अप्रकाशित काम पूरे हो जाते तो हिन्दी साहित्य की समृद्वि होती। उनका सहज-आत्मीय व्यक्तित्व और कृतित्व हमारे लिये प्रेरणास्रोत है।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

प्रेम न बाड़ी उपजै

महारास की अद्भुत बेला है। राधा-कृष्ण के रमने की बेला। प्रेम बन जाने का लक्ष्य। प्रिया-प्रीतम दोनों लुटे हुये हैं। श्री कृष्ण राधा बन गये हैं। राधा श्रीकृष्ण हो गईं हैं। दोनों ही एक-दूसरे की प्रतिकृति हो गये हैं। चहुँ दिशा में बस राधा-कृष्ण हैं। कृष्ण राधा हैं। कृष्ण की बंसी और मोरपंख राधिका के काजल और केशपाश में गुंथी कली से एकाकार हो गये हैं। संपूर्ण सृष्टि एकाकार हो गई है। भारतीय परिवेश में प्रेम यही है। प्रेम राधाभाव है। कृष्णभाव है। महाभाव है। समष्टि चेतना है। लूट जाना है। वंचित हो जाना है। बेखुद हो जाना है। मिट जाना है। और अगर ज्ञानेन्द्रपति की कविता के भावो मंे कहे तो ’दुनिया की नजर में बर्बाद, पर दिल की दौलत से मालामाल’... हेा जाना है।




कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई और राधा-कृष्ण, रति-कामदेव, शकंुतला-दुष्यंत भारतीय प्रेम की परम अभिव्यक्ति हैं। पराकाष्ठा हैं। लैला-मजनंू, हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद, सोहनी-महींवाल, सस्सी-पुन्नू, सारंगा-सदावृक्ष, नल-दमयन्ती...... जैसी लोकगाथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेम की गली संकरी गली है। प्रेम की राह नाजुक राह है।



सृष्टि के आरंभ से ही चली आ रही प्रेमभावना हर दिल में व्याप्त होती है। संपूर्ण जगत इस मधुर भाव से आसक्त है। देशों-विदेशों -महादेशों का इतिहास और साहित्य प्रेम-कथाओं से अटा पड़ा है। वैलेन्टाइंस डे ऐसी ही महान प्रेम अभिव्यक्ति को सम्मान देने का दिन है। वैलेंटाइंस डे अनछुए अहसासों, नाजुक पलों को सलाम करने का दिन है। प्रेम के पुरोधा संत वैलेंटाइन को याद करने का, उन्हें नमन करने का दिन है। संकरी गलियों और नाजुक राहों से गुजरता प्रेम आज ग्लोबलाइज्ड हो गया है। वैश्विक गांव में मॉडर्न हो गया है। आज प्यार मोबाइल फोनों में है, रेडियो में है, टेलिविजन में है। पोस्टरों, बैनरों, सिनेमा, इंटरनेट में है। ऑरकुट में है। फेसबुक मे है। बाजार में है। इसकी स्वीकृति और व्यापक हुई है। भारत में वैलेंटाइन डे प्रेम माह बसंत में आता है। हमारे समाजिक परिवेश में यह दिन घुलता जा रहा है। बसंतोत्सव हो गया है। प्यार मस्त हो गया है। बेबाक हो गया है। किसिंग, चैटिंग, डेटिंग हो गया है। वैलेंटाइन्स डे़ हो गया है। प्रेम माह का गुलाबी रंग लाल गुलाब की पंखुड़ियों में समाता है और इजहार-ए-मोहब्बत बन खिल जाता है। मौसम की चुहल टेडी-बियर के नटखटपने में घुल-मिल जाती है। प्रेम पगी फिजाओं की मिठास चॉकलेट-कैंडियों में समा गई है। ऋतुराज की खुमारी और नशा युवा दिलों को मदहोश किये देता है। कहना नहीं होगा कि प्रेम की- प्यार की वास्तविक मर्यादा ही मदहोश हो गई है। परिभाषा ही बदल गई है। उर्दू की तरह खुबसूरत प्यार नये सामयिक संस्करण के दौर से गुजर रहा है एकदम खुला। सबके सामने। कॉमन।लोकल। ग्लोबल। विरोधी लाख नाक-भौं सिकोडे़ं। मगर यह प्रेम की नई बानगी है। नाटक है। खेल है। आज के व्यस्त समय और जीवन के बेरंग और बेमानी हो जाने के बीच का स्पेस ही तो प्रेम नहीं बनता जा रहा ? कहीं प्रेम हमारी प्रगति और आजाद खयाली का पर्याय तो नहीं बन रहा ? क्या प्रेम एक अवसर है, आइडिया है, समारोह है ? नहीं! प्यार सिर्फ प्यार है। अलौकिक अनुभुति है। यह अनुभुति जीवन को जड़ता से उबारती है। प्राणीमात्र को देह की भौतिक सीमाओं से परे- पार ले जाती है। पं0 विद्यानिवास मिश्र के शब्दो में “यही मानुष जन्म की सार्थकता है कि पुरूष नारी के लिये या नारी पुरूष के लिये जब आकर्षण से खिंचकर आकांक्षा करें, यह केवल प्यार का प्रारंभ हो, यह स्नेह की वह पहली बूंद हो जो पानी से भरी थाली में गिरती है तो फैलते- फैलते थाली की बारी तक चली जाती है और थाली को कितना भी धोइए थाली को छोड़ने के लिये तैयार नहीं होती, कुछ न कुछ लगी ही रहती है उल्टे धोने वाले हाथ को स्नेहिल कर देती है“



वैलेंटाइन सप्ताह चल रहा है। प्रेम के नाम एक सप्ताह। एक सप्ताह जमीन से ऊपर चलने का। स्वयं को अनुभव करने का एक सप्ताह। गुलाबांे, चॉकलेटों, टेडी बियरों, लुभावने गिफ्ट्स, आकर्षक ऑफरों का महकता, गुनगुनाता, प्यार लुटाता, मिठास लुटाता सप्ताह। आकर्षण सहज मानवीय स्वभाव है। प्यार चिरस्थायी अनुभव। उत्साह और मौज की अभिव्यक्ति शीघ्रता, तत्परता और उत्तेजनाओं से बची रहे। जीवन की केसरी सुरभि पूर्ण विकसित हो जाए। मन की अभिव्यक्ति पवित्र अभिव्यक्ति बन जाए। मर्यादा का सीमोल्लंघन प्रेम का पतन है। प्रेम प्रतीकों का अपमान है। हुल्लड़बाजी, सस्ती-मस्ती, लंपटता प्रेम नहीं। प्रेम सुबास बिखेरे तो प्रेम है। प्रेम चाहना नहीं। न्योछावर हो जाना है। प्यार महज ऐन्द्रिक व्यापार न बन जाये। उपभोक्ता-संस्कृति की बलि न चढ़ जाये।



बसंत की शुरूआत है ठंढ की मारी, झुलसी, पीत पŸिायां झड़ रही हैं। पŸिायों के विरह से ठूंठ हुये पेड़ की तरह की हम आसक्त न हो जाएं। प्रेम पगी नयी पŸिायां हमारे प्यार को फिर से हरा कर देंगी। प्रेम को महसूसना जरूरी है। प्रेम परितृप्ति बनकर समस्त सृष्टि की प्यास बुझा रहा है। हमारे अंदर ऐसी परितृप्ति ऐसी प्यास उमड़े तो प्रेम है। वैलेंटाइन डे है। हर दिन है। हर पल है। हर क्षण है। प्रेम कलुषित न होने पाये। तभी संत वैलेंटाइन को सच्ची श्रच्दांजली है। यह सबका है, सबके लिए है और उल्लास से भरा है। इसे बदरंग और बाजारू बनने से बचाना है और बचना है।

                                                                       सविता पाण्डेय